11 lord krishna quotes in hindi

Photo of author

By amit jaiswal

भगवान श्रीकृष्णा, हिन्दू धर्म के महानतम आदर्श और दिव्य पुरुषों में से एक हैं। उनके अद्वितीय विचार और उपदेशों ने लाखों लोगों के जीवन को प्रकारांतरित किया है। उनके उपदेशों के माध्यम से हम जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायक हो सकते हैं। इस लेख में, हम श्रीकृष्णा के अनमोल विचारों को जानेंगे जो हमें जीवन के मार्गदर्शन में मदद कर सकते हैं।

श्रीकृष्णा के अमूल्य विचार:

  1. “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”: यह विचार श्रीकृष्णा के उपदेशों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे कहते हैं कि हमें केवल कर्म में लगन करनी चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
  2. “योगः कर्मसु कौशलं”: इस विचार में श्रीकृष्णा योग की महत्वपूर्णता पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि योग के माध्यम से हम कर्म में कौशल प्राप्त कर सकते हैं और जीवन को सही दिशा में ले सकते हैं।
  3. “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”: श्रीकृष्णा सदाचारी लोगों की रक्षा करने और दुष्कर्मियों का नाश करने का महत्व बताते हैं।
  4. “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।”: इस वाक्य में श्रीकृष्णा अपनी दिव्य माया का वर्णन करते हैं जिसे समझना अत्यंत कठिन होता है।
  5. “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।”: इस उपदेश में श्रीकृष्णा जीवन की अनित्यता और परिवर्तन के विचार को संक्षेपित करते हैं।

निष्कर्ष: श्रीकृष्णा के विचार हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करते हैं। उनके उपदेशों से हम सही मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं और आत्मविकास कर सकते हैं। श्रीकृष्णा के विचारों को अपने जीवन में अंगीकार करके हम उच्चतम आदर्शों की ओर बढ़ सकते हैं।

  1. “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” – भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 47
  2. “जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।” – भगवद गीता, अध्याय 4, श्लोक 9
  3. “कामयेस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥” – भगवद गीता, अध्याय 7, श्लोक 20
  4. “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥” – भगवद गीता, अध्याय 4, श्लोक 7
  5. “दैवी सम्पद्विमोक्षायै निबंधायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।” – भगवद गीता, अध्याय 16, श्लोक 5
  6. “योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥” – भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 48
  7. “वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।” – भगवद गीता, अध्याय 7, श्लोक 19
  8. “क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥” – भगवद गीता, अध्याय 12, श्लोक 5
  9. “वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्॥”
  10. “कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥” – भगवद गीता, अध्याय 4, श्लोक 18

निष्कर्ष:भगवान श्रीकृष्णा के अनमोल विचार हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करते हैं और हमें सच्चे आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार करके हम सफलता, समृद्धि, और आनंद की दिशा में प्रगति कर सकते हैं।

Leave a Comment